तेली का मंदिर अनूठा मंदिर
ग्वालियर के किले में स्थित तेली का मंदिर अनूठा मंदिर है. यह मंदिर लगभग तीस मीटर ऊँचा है और इस विशालकाय मंदिर की बनावट में नागर और द्रविड़ शैलियों का मिश्रण है.चार दिशाओं में दरवाज़े हैं परन्तु पूर्वी प्रवेश ही खुला है. बाकी तीन दिशाओं के दरवाज़ों पर एहतियातन पत्थर लगा दिए गए हैं. हज़ार बारह सौ साल पुराने मंदिर में जगह जगह दरारें पड़ी हुई हैं.


कॉफ़ी शॉप और सोडा फैक्ट्री के रूप में
मंदिर के अंदर देवियों, सांपों, प्रेमी युगलों और गरुड़ की मूर्तियां हैं जिनकी वास्तुकला और शैली आपको मंत्र मुग्ध कर देगी। इस मंदिर की एक और ख़ास बात है कहा जाता है कि गुलामी के समय इस मंदिर का इस्तेमाल अंग्रेज अफसर कॉफ़ी शॉप और सोडा फैक्ट्री के रूप में करते थे। ग्वालियर के किले में मौजूद इस इमारत का शुमार किले के सबसे प्राचीन स्मारकों में होता है।

झाड़ झंखाड़ से ढक गया
बहरहाल पहले कुतुबुद्दीन ऐबक और फिर इल्तुतमश के हमले में में मंदिर को काफी नुकसान पहुंचा. इसके बाद मंदिर का खंडहर झाड़ झंखाड़ से ढक गया. कुछ समय बाद जब किले पर मराठा शासन हुआ तो उस दौरान मंदिर में सुधार किया गया. फिर किले पर अंग्रेजों ने हमला बोला और अधिकार जमा लिया. फिर मन्दिर छुप गया.


नाम को लेकर प्रचलित हैं कई कहानियां
‘तेली मंदिर’ के नाम के पीछे कई कहानियां भी प्रचलित हैं। एक कहानी के अनुसार इसका निर्माण तेलंगाना की राजकुमारी ने करवाया था इसलिए इसका नाम तेली मंदिर पड़ गया। एक अन्य कहानी के अनुसार मंदिर का निर्माण तेल या व्यापार करने वाले लोगों ने मिलकर करवाया था इसलिए मंदिर का नाम तेली मंदिर पड़ गया।
मंदिर की संरचना बहुत बड़ी है, जिसकी ऊंचाई 100 फुट है। इसकी छत की वास्तुकला द्राविड़ीयन शैली की है जबकि नक्काशियां और मूर्तियां उत्तर भारतीय शैली की हैं। इसकी वास्तुशैली हिंदू और बौद्ध वास्तुकला का सम्मिश्रण है। यह ग्वालियर के किले के परिसर का सबसे पुराना स्मारक है। कहा जाता है कि तेली का मंदिर पहले भगवान विष्णु का मंदिर था जो बाद में भगवान शिव का मंदिर बन गया।