सास बहू मंदिर असली नाम सहस्रबाहु मंदिर है।
राजस्थान के उदयपुर शहर के बाहरी छोर पर अत्यंत कलात्मक और ऐतिहासिक मंदिर है, जिसे सास बहू मंदिर के नाम से जाना जाता है। वैसे इसका असली नाम सहस्रबाहु मंदिर है। ग्यारहवीं सदी के आरंभ में बना ये मंदिर विकसित शैली और बेहतरीन अलंकरण के लिए जाना जाता है। मंदिर का परिसर 32 मीटर लंबा और 22 मीटर चौड़ा है।

पत्नी और बहू के लिए बनवाया।
मंदिर का निर्माण कछवाहा वंश के शासक महिपाल ने करवाया था। वह भगवान विष्णु का भक्त था। कहा जाता है कि उसने ये मंदिर अपनी पत्नी और बहू के लिए बनवाया। इसलिए इसका नाम तभी से सास बहू का मंदिर है। मंदिर ऊंचे जगत पर बना हुआ है। इसमें प्रवेश के लिए पूर्व में मकरतोरण द्वार है। मंदिर पंचायतन शैली में बनाया गया है। मुख्य मंदिर के चारों तरफ देवताओं का कुल बसता है। हर मंदिर में पंचरथ गर्भगृह, खूबसूरत रंग मंडप बने हैं। सास बहू यानी सहस्रबाहु मंदिर मूल रूप से भगवान विष्णु को समर्पित है। हजार हाथों वाले देवता वही तो हैं। परिसर में दूसरा प्रमुख मंदिर शिव का है।

सहस्‍त्रबाहू  से बना सास-बहू मंदिर
10 वी शताब्दी के कच्छवाहा वंश के राजा महिपाल के द्वारा बनवाये गये इस मंदिर को सहस्‍त्रबाहू के नाम से जाना जाता है। सहस्‍त्रबाहू का मतलब होता है हजार भुजाओं वाला। यहा भगवान विष्णु की आराधना की जाती है। सहस्‍त्रबाहू नाम का लोग सही से उच्चारण नहीं कर पाते थे इस लिए धीरे-धीरे इस मंदिर का नाम सास-बहू मंदिर पड़ गया।

खजुराहो के मंदिरों की तरह असंख्य मूर्तियां
इन मंदिरों में ब्रह्मा, विष्णु, शिव, राम, कृष्ण, बलराम सभी विराजते हैं। प्रवेश द्वार पर मां सरस्वती की मूर्ति है। यह राजस्थान के अत्यंत प्राचीन मंदिरों में से एक है। मंदिर की दीवारों पर अंदर और बाहर खजुराहो के मंदिरों की तरह असंख्य मूर्तियां बनी हैं। इन मूर्तियों में कई कामशास्त्र से भी जुड़ी हुई हैं। कला प्रेमी इस मंदिर को घंटों निहारते हैं।

कई हमले झेले
सास बहू मंदिर ने कई हमले झेले हैं। मंदिर का काफी हिस्सा हमले की भेंट चढ़ चुका है। फिर भी जितना हिस्सा बचा है, वह दर्शनीय है। 1226 में इल्तुतमिश के हमले के दौरान पहली बार नागदा शहर और सहस्रबाहु मंदिर तबाह हुआ।

मंदिर को चूने और रेत से बंद करवा
इतिहास में एक दौर ऐसा भी आया कि सास-बहू के मंदिर को बंद करवा दिया गया था। बताया जाता है कि दुर्ग पर मुगलों ने जब कब्जा किया था तो सास-बहू के मंदिर को चूने और रेत से भरवाकर बंद करवा दिया था।कुछ समय बाद मंदिर एक रेत का टापू जैसे लगने लगा था। जब अंग्रेजों ने दुर्ग पर कब्जा कर लिया था, तब मंदिर को दुबार खुलवाया गया। आज भी गर्भगृहों से आराध्य देवों की मूर्तियां गायब हैं।